पंडित श्रीसूरज प्रसाद शर्मा, पौराणिक, संगीतविद (तबला)

जीवनी :- पंडित श्री सूरज प्रसाद शर्मा , पौराणिक, संगीतविद (तबला)

सूखाताल के निवासी पंडित श्री सूरज प्रसाद शर्मा जी का जन्म 16 जून 1947 को कुंडा के पास के ग्राम अखरा में हुआ । वे अपने माता पिता के तीसरे संतान थे । उनके पिताजी का नाम पंडित बृजभूषण प्रसाद शर्मा एवम माता जी का नाम खेदिया देवी था । उनके 2 बड़े भाई हलधर प्रसाद एवम बलदाऊ प्रसाद शर्मा थे । उनके छोटे भाई का नाम नंदकिशोर शर्मा था । पंडित जी का बाल्यकाल सामान्य ही रहा परंतु वे बाल्यकाल से ही प्रखर बुद्धि वाले रहे । उनकी प्रारम्भिक शिक्षा कुंडा में ही हुई बाद में अध्ययन के लिए संस्कृत विद्यालय धमतरी गए जहां से उन्होंने संस्कृत की शिक्षा एवम अपना मेट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण किया ।
जब वे बालक ही थे तब उनकी रुचि संगीत में हो गई थी क्योंकि घर मे संगीत का पूरा माहौल था उनके दोनों बड़े भाई गायन में रुचि रखते थे जिन्हें देख देख कर इन्होंने भी संगीत के क्षेत्र में कदम बढ़ा दिया । घर मे अभ्यास के बाद रामायण मंडली में अपना प्रदर्शन किया करते थे । धीरे धीरे उनका यह प्रक्रम आगे बढ़ रहा था कि किसी मंच पर किसी साधारण से कलाकार के द्वारा इनके तबला वादन को धुत्कार दिया गया जिससे छुब्ध होकर इन्होंने अपने प्राण तक त्यागने का विचार बना लिया था परंतु दैवीय प्रेरणा से इनको आभास हुआ कि किसी के धुत्कार से जीवन त्यागना मूर्खता होगी अपितु उस व्यक्ति का मुँह बंद करने का उचित तरीका अपने कला में निखार लाकर दिया जाना श्रेयस्कर होगा । फिर इन्होंने अपने हाथ मे लोहे का कड़ा पहन कर 8-8 घंटे रोज तबला बजाने का अभ्यास किया जिससे इनके कला में उत्तरोत्तर निखार आता चला गया ।
इनकी कला की कीर्ति स्थानीय रामलीला मंडली जो कि छिरहा वाले आदरणीय भरत प्रसाद शर्मा जी द्वारा संचालित थी वहां से बढ़ी । वहां इनका परिचय आदरणीय मदन सिंह ठाकुर एवम चंदन सिंह ठाकुर आदि से हुई ।इनके साथ पंडित जी की खास जुगलबंदी और मित्रता थी । धीरे धीरे इनकी संगीत की साधना आगे बढ़ती गई ।
संगीत साधना के साथ ही गाँव के लोगो के अनुरोध पर भागवत कथा और रामकथा में भी इनकी रुचि जागृत हुई और धीरे धीरे रामकथा के ख्याति लब्ध विद्वानों में इनकी गिनती होने लगी । अपने हसमुख व्यवहार के कारण अपने से बड़ों और छोटों के द्वारा इन्हें बहुत प्रेम और सम्मान सदैव मिलता रहा । कुंडा से श्री गोवर्धन प्रसाद शर्मा , दुल्लापुर से श्री जगदीश प्रसाद शर्मा , रैतापारा से श्री द्वारिका प्रसाद शर्मा सबका इनको स्नेह सदैव प्राप्त होता रहा परंतु इनकी संगीत की जुगलबंदी जितनी पंडित शिवकुमार शास्त्री जी राजपुरोहित कवर्धा के साथ जमती थी उतनी सायद किसी के साथ नही जमती थी । इनके संगीत साधना के ये सभी लोग पोषक थे । क्षेत्रीय कलाकारों की क्या कहें राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों के साथ भी पंडित जी के संगत को सभी की सराहना प्राप्त हुई ।


25 वर्ष की उम्र में इनका विवाह सूखाताल में श्री रामशरण शर्मा जी के घर मे हुआ । इनकी पत्नी का नाम श्रीमती अरुणा देवी था । चुकी इनके स्वसुर जी के कोई पुत्र संतान नहीं थे इस कारण से इनको सूखाताल में रहना पड़ा । यहां के लोगों से भी इनको उतना ही प्रेम और सम्मान प्राप्त हुआ जितना कि उनके जन्मभूमि में मिलता था । वे सूखाताल को अपना कर्मभूमि माना करते थे । यहां आने के बाद इनको प्रथम संतान के रूप में एक बालक प्राप्त हुआ मगर कुछ समय का ही संतान सुख देकर वो बालक परमधाम को चला गया । इस बालक संतान के बाद इनको 3 पुत्री और 2 पुत्र संतान के रूप में मिले । भरा पूरा परिवार था । संगीत तथा रामकथा की साधना इसके बाद भी नही रुकी निरंतर चलती ही रही । पंडित जी की विशेष रुचि लेखन में भी थी । क्षेत्रीय छतीसगढ़ी भाषा मे उन्होंने सैकड़ो भजन और गीत लिखे और उनको संगीत भी दिया था । लोग उनकी इसी कला के कायल थे जिस भी प्रसंग को कह रहे हों उसी प्रसंग में तुरंत गीत बनाकर प्रस्तुत कर देते थे । उनके द्वारा गाँव के बहुत से लोगों को संगीत सिखाया गया तथा और भी बहुतेरे शिष्य उनके हुए जो आज भी संगीत का आलख जगा रहे हैं । सूखाताल में साप्ताहिक रामायण पंडित जी की ही देन है जो आज तक अनवरत चलती चली आ रही है । उनके अंदर अपने बड़ों के लिए सम्मान एवम छोटों के प्रति अपार स्नेह था । वे अपने आने वाली पीढ़ी अर्थात उभरते हुए कलाकारों को बहुत अधिक प्रोत्साहित किया करते थे ।

अपने सभी पुत्र पुत्रियों का सभी संस्कार उन्होंने किया अर्थात सबका विवाह आदि कर दिया फिर उनका संगीत साधना और उफान पर आ गया । धीरे धीरे उम्र बढ़ा परंतु उनके अंदर का कलाकार और कथाकार जवान होता चला गया । मुझे आज भी याद है कि जिस दिन वे इस संसार से विदा हुए उसके ठीक पहले दिन गाँव मे शनिवार को साप्ताहिक रामायण का आयोजन था जिसमे उन्होंने ऐसी रामकथा कही जैसा उनके द्वारा सायद उस दिन से पहले कही भी सुनने को नही मिला था साथ ही तबला भी बजाया ।
22 मई 2016 को अपनी धर्मपत्नी का इलाज कराने बिलासपुर गए और स्वयं हॉस्पिटल के सामने ही हृदय गति रुक जाने से संगीत जगत का जगमगाता सूरज अस्त हो गया । 69 वर्ष की आयु में वे हम सबको छोड़कर भगवान के चरणों मे अपना स्थान बनाने चले गए । उनका जाना हम सबके लिए अपूरणीय क्षति है जो किसी के भी द्वारा पूरी नही की जा सकती है । संगीत और कथा जगत स्तब्ध रह गया था उनकी तेरहवीं में उनके अभिन्न श्री चंदन सिंह जी को संगीतांजली में शामिल होने कहने पर उन्होंने कहा कि मैं आज के बाद नही गाऊंगा मेरा संगतकार चला गया और सायद उसके बाद वे कभी नही गाए । ऐसे थे हमारे पूज्य पिता जी के प्रेमी ।
सम्पूर्ण आदर के साथ पिता जी के कुछेक कार्य जो मैंने उन्ही से सुना था आप सबके समक्ष जीवनी के रूप में प्रेषित है ।

                               उदयकुमार शर्मा
कनिष्ठपुत्र 
स्व.पंडित श्रीसूरजप्रसाद शर्मा

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